गणतंत्र दिवस: भारत और पाकिस्तान में असली फर्क संविधान का ही है...
सवालों से गणतंत्र कभी कमज़ोर नहीं होता है. मुश्किल सवालों से गुजरता हुआ भारतीय गणराज्य लगातार मजबूत हुआ है.
लोकतांत्रिक संस्थाएं बचेंगी तभी देश बचेगा....
क्या भारतीय गणतंत्र सचमुच गर्व करने लायक है?
15 अगस्त आज़ादी के महान संघर्ष को याद करने का दिन होता है, तो 26 जनवरी भारतीय गणराज्य के शौर्य और शक्ति के प्रदर्शन का. इस दिन राजपथ पर भव्य परेड होती है, जिसकी सलामी राष्ट्रपति लेते हैं. राजसी समारोह की भव्यता के बीच यह बात थोड़ा पीछे चली जाती है कि आज के दिन भारत ने लिखित संविधान को अपनाया था, जिसे दुनिया के बेहतरीन संविधान में एक माना जाता है.
यह पूछा जाना स्वभाविक है कि क्या विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपने संविधान की भावनाओं के अनुरूप चल रहा है? सवाल ऐसा है, जिससे सत्ता में बैठे लोगो को हमेशा तकलीफ होती है. सरकार चाहे जिस पार्टी की भी हो, वह अपने नागरिकों को यही बताती है कि भारत एक महान देश है. इसकी महानता पर कोई शक मत करो, केवल गर्व करो. सचमुच गर्व करना अच्छी बात है. लेकिन सवाल किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का ऑक्सीजन होते हैं. सवाल पूछना हर नागरिक का बुनियादी दायित्व है, जो उसे संविधान ने सौंपा है. भारतीय संविधान में साफ-साफ कहा गया है कि यह भारत के हरेक नागरिक का कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद, ज्ञानानर्जन और अपने भीतर प्रश्न पूछने की भावना का विकास करे.
क्या भारतीय गणतंत्र सचमुच गर्व करने लायक है?

बाकी सवालों पर बाद में आएंगे, सबसे पहले इस बात की चर्चा कि भारतीय गणतंत्र में आखिर गर्व करने लायक क्या है? भारत विविधता और जटिलताओं से भरा एक देश है. अपने भीतर अनगिनत संस्कृतियां समेटे यह देश सैकड़ो रजवाड़ो और रियासतों को मिलाकर एक आधुनिक लोकतंत्र बना. मानव इतिहास के सबसे हिंसक दौर की स्मृतियों को भुलाकर और धार्मिक आधार पर हुए विभाजन की त्रासदी को दरकिनार करके भारत ने एक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष देश बनने का संकल्प लिया. हाशिए पर पड़े अनगिनत जातीय समूहो वाले इस देश ने अपने संविधान में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों को अपनाया और एक लोक कल्याणाकारी राज्य बनने का महान लक्ष्य रखा.
संविधान में तय किए गए सभी लक्ष्यों को लेकर कई तरह के सवाल हैं. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि किसी भी मोर्चे पर देश को पूरी तरह नाकाम नहीं माना जा सकता है. चुनावी गड़बड़ी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमज़ोरी की शिकायतों के बावजूद डेमोक्रेसी भारत में कामयाब रही है. संसदीय लोकतंत्र के साथ संघीय व्यवस्था भी कारगर ढंग से चल रही है. अगर इमरजेंसी के डेढ़ साल के दौर को छोड़ दें तो अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि लोकतंत्र को गंभीर खतरा है. पूरे दक्षिण एशिया में केवल श्रीलंका ही एक एक ऐसा देश है, जहां के लोकतंत्र की तुलना भारत से की जा सकती है.
स्थिर भारत और डांवांडोल पाकिस्तान

विचारधारा से लेकर लक्ष्य तक भारत और पाकिस्तान की राजनीतिक सोच में बुनियादी अंतर रहा है. इसलिए दोनों देशों की तुलना नहीं की जानी चाहिए. लेकिन पाकिस्तान का निर्माण भारत के टूटने से हुआ था. भारत और पाकिस्तान दोनो के पास एक ही तरह की राजनीतिक विरासत थी. दोनो ने ब्रिटेन की संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाया था. और तो और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने भी नेहरू की तरह अपने सभी नागरिकों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का सपना देखा था. इसलिए ना चाहते हुए दोनो देशों को एक-दूसरे से अपनी तुलना करनी पड़ती है.
आजादी के बाद भारत ने अपना पूरा ध्यान बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित करने में लगाया. लोकतांत्रिक संस्थाओं का गठन हुआ, उन्हे मजबूत किया गया. लेकिन पाकिस्तान आज़ाद होते ही अपने अंतर्विरोधो में फंसता चला गया. 1950 में लिखित संविधान अपनाकर भारत एक गणराज्य बन गया. दूसरी तरफ पाकिस्तान को अपना संविधान बनाने में 26 साल लगे और वह भी पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया. जिन्ना की मौत के बाद से ही पाकिस्तान में नेतृत्व का संकट गहराने लगा. 1951 में पाकिस्तान में सैनिक तख्ता पलट की पहली कोशिश हुई.
1958 में पाकिस्तान में मार्शल लॉ लगा और उसके अयूब खान ने सत्ता हथिया ली. उस वक्त तक भारत में दो संसदीय चुनाव हो चुके थे. पाकिस्तान में लंबे सैनिक शासन के खात्मे के बाद जुल्फिकार अली भुट्टो एक लोकतांत्रिक नेता के रूप में उभरे. 1973 में उन्होने पहली बार पाकिस्तान में संविधान लागू करवाया लेकिन चार साल बाद भुट्टो सैनिक तख्ता पलट की भेट चढ़ गए. उन्हे फांसी दे दी गई और जनरल जिया-उल-हक ने सत्ता हथिया ली. जिया के शासनकाल में पाकिस्तान एक लिबरल इस्लामिक स्टेट से कट्टरपंथी मुस्लिम मुल्क में तेजी से तब्दील होना शुरू हो गया जिसका नतीजा आज दुनिया के सामने है.
अल्लाह, अमेरिका और आर्मी के हवाले पाकिस्तान

आज़ादी के बाद के करीब आधे वक्त में चार फौजी तानाशाहों अयूब खान, याह्या खान, जिया-उल-हक और परवेज़ मुशर्रफ ने पाकिस्तान पर राज किया. फौजी हुकूमतों की आवाजाही ने पाकिस्तान में एक ऐसा सिस्टम बना दिया है कि सरकार भले ही लोकतांत्रिक हो लेकिन देश पर फौज की पकड़ ढीली नहीं पड़ेगी. यही वजह है कि मामूली राजनीतिक हलचल होने पर भी पाकिस्तान पर तख्ता पलट का खतरा मंडराने लगता है. कहते हैं कि पाकिस्तान तीन `ए’ के सहारे चलता है. अल्लाह, आर्मी और अमेरिका.
इसका सीधा मतलब यह है कि पाकिस्तान ऐसा देश है, जो धार्मिक कट्टरता में सिर से पांव तक डूबा हुआ है. सरकार चाहे किसी की भी हो वह धार्मिक कट्टरवादी समूहों को नाराज़ करके कोई काम नहीं कर सकती. भारत की सेना हमेशा चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार के हवाले रही है. लेकिन पाकिस्तान में सरकारे सेना के हवाले हैं.
शीत-युद्ध के दौर में पाकिस्तान ने अमेरिका के पिट्ठू होने का रास्ता चुना. उसी समय से पाकिस्तानी संप्रभुता सवालों के घेरे में रही है. 2001 में अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले के बाद हालात इस तरह बदले कि पाकिस्तान अपने ही खेल में फंस गया. आज वह गृह-युद्ध जैसी स्थिति झेल रहा है. अमेरिकी दबाव को कम करने के लिए पाकिस्तान ने चीन के दरवाज़े अपने लिए पूरी तरह खोल दिए हैं. यह किसी एक ताकत की गोद से निकलकर दूसरी शक्ति के गोद में बैठने जैसे मामला है.
भारत कहीं हिंदू पाकिस्तान बनने की राह पर तो नहीं?
पड़ोसी पाकिस्तान या फिर बांग्लादेश को देखकर इस बात का संतोष हो सकता है कि भारत अब तक सही रास्ते पर है. लेकिन पिछले कुछ सालों में जिस तरह नए किस्म के धार्मिक उन्माद ने सिर उठाया है, उसे सवाल उठने लगे हैं कि कहीं भारत अपनी राह छोड़कर हिंदू पाकिस्तान बनने की दिशा में तो नहीं बढ़ रहा है.
यह चिंता यूं ही नहीं है. हथियारबंद ताकतवर गुटों का खुलेआम सड़क पर उतरना, बीफ खाने के शक में किसी को पीट-पीटकर मार देना, असहमत लोगो को चुन-चुन कर निशाना बनाया जाना, बाबा राम रहीम और रामपाल जैसे स्वयंभू धार्मिक नेताओं के समर्थकों का खुलेआम हिंसा करना, दलितो और अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले, जाट, पाटीदार और राजपूत जैसे जातीय समूहों का तांडव और सरकारी तंत्र की बेबसी. लगातार और बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जिन्हे देखकर लगता है कि हालात काबू में नहीं आए तो हम `हिंदू पाकिस्तान’ बनने की दिशा में इतना आगे बढ़ चुके होंगे कि पीछे लौटना नामुकिन हो जाएगा.
हिंसा कोई नई बात नहीं है. लेकिन असली चिंता यह है कि सरकारें हिंसक तत्वों से किस तरह निपटती है. पिछले तीन-चार साल में कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाले जितने भी वाकये हुए हैं, उन सब पर केंद्र और राज्य सरकारें बेबस नज़र आई हैं. कई जगहों पर तो सरकार ऐसे तत्वों के पक्ष में खड़ी दिखाई दी है.
क्या सचमुच संविधान खतरे में हैं?
देश में बहुत कुछ ऐसा चल रहा है, जिसे देखकर लगता है कि संविधान खतरे में है. सरकार का काम यह सुनिश्चित करना है कि देश में कानून का राज चलेगा. लेकिन कई जगहों पर कानून ठेंगे पर है. फिल्म पद्यावत को लेकर चल रहा विवाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने सेंसर बोर्ड की स्वीकृति के बावजूद फिल्म की रीलीज़ पर रोक लगा दी क्योंकि उन्हे अपने एक वोटर समुदाय को खुश रखना है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फिल्म तो रीलीज़ हो गई. लेकिन यह साफ लग रहा है कि उपद्रवी ताकतों से निपटने के लिए सरकारें कुछ नहीं कर रही हैं. स्कूली बच्चों के बस तक पत्थर बरसाए जा रहे हैं और सरकारें मूक-दर्शक बनी हुई हैं. हाल ही में एक केंद्रीय मंत्री ने कहा था कि हम सरकार में संविधान बदलने के लिए ही आए हैं. हालांकि मंत्री महोदय ने बाद में अपने बयान के लिए माफी मांग ली. लेकिन केंद्र और अलग-अलग राज्य सरकारों के मंत्रियों की ओर से ऐसे बयान लगातार आते रहे हैं. यह सब देखकर लगता है कि देश में इस समय सबकुछ पूरी तरह ठीक नहीं चल रहा है.
लोकतांत्रिक संस्थाएं बचेंगी तभी देश बचेगा

संविधान की सबसे बड़ी संरक्षक यानी सुप्रीम कोर्ट के काम करने के तरीके पर हाल के दिनों में गंभीर सवाल उठे हैं. ऐसा पहली बार हुआ है, जब कोर्ट के चार वरिष्ठ जजो ने खुलेआम चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया पर गंभीर आरोप लगाए हैं. आरोप कितने सही हैं और कितने गलत, इसे लेकर अलग-अलग तर्क हो सकते हैं. इस बात पर भी अलग-अलग राय हो सकती है कि न्यायधीशों को इस तरह खुलकर अपनी बात कहनी चाहिए थी या नहीं. लेकिन जो कुछ हुआ उसने न्याय व्यवस्था में लोगो के भरोसे को बुरी तरह हिलाकर रख दिया.
संस्थाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद होती है. यह बुनियाद हिलती दिखाई दे रही है. चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका तक तमाम संस्थाओं के काम करने के तौर-तरीके और खासकर उनकी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठे हैं. टू जी मामला इसका एक बड़ा उदाहरण है. सीवीसी यानी चीफ विजिलेंस कमिश्नर ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यूपीए टू सरकार ने जिस तरह टू जी के लाइसेंस बांटे उससे देश को करीब 1.76 लाख करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा.
लंबी अदालती कार्रवाई के बाद इस मामले के सभी आरोपी बेदाग छूटे. कांग्रेस ने इसे अपनी जीत बताया. मामले में जेल काट चुके पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए राजा का उनके समर्थकों ने जगह-जगह नागरिक अभिनंदन किया. टू जी वही मामला था, जिसकी वजह से यूपीए सरकार को 2014 के चुनाव में बुरी तरह शिकस्त झेलनी पड़ी थी.
अदालत के फैसले के बाद यह साफ हो गया कि जीत चाहे किसी की भी हो लेकिन यह देश की जनता और सिस्टम की हार है. अगर सीवीसी ने एक ऐसी रिपोर्ट तैयार की जो सही नहीं थी, तो एक संस्था के तौर पर उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं. अगर रिपोर्ट सही थी, तो इसका मतलब यही है कि जांच एजेंसियों ने अपना काम ईमानदारी से नहीं किया. निष्कर्ष यही है कि संस्थाएं नाकाम रही है, चाहे वह सीवीसी हो या फिर सीबीआई. संविधान लागू होने की सालगिरह मना रहे देशवासियों को इस बात पर सोचना चाहिए कि संस्थाएं बचेंगी तभी देश बचेगा.
(साभार:- फर्स्ट पोस्ट & स्वतंत्र भारत न्यूज़ द्वारा एडिटेड)
संपादक- स्वतंत्र भारत न्यूज़
swatantrabharatnews.com







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