शेख ख़ादर मोइनुद्दीन: जंग -आज़ादी -ए - हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार.
लहू बोलता भी है
आईये, जंग -आज़ादी -ए - हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार को जानते हैं.
शेख ख़ादर मोइनुद्दीन: जंग -आज़ादी -ए - हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार___
शेख ख़ादर मोइनुद्दीन की पैदाइश वेपादा गांव (वीजयानागराम; मौजूदा आंध्र प्रदेश में) 31 दिसम्बर 1926 को हुई थी। शेख साहब के वालिद का नाम शेख पीर साहब और मां का नाम बुर्राख़ था। ख़ादर मोइनुद्दीन अपने घर की माली हालात को देखते हुए सन् 1938 में बर्मा को हिजरत कर गये और वहां की रबर फैक्ट्री में कुली का काम करने लगे। इन्होंने किंग आईलैण्ड रबर स्टेट, (मरगोई; बर्मा) में साढ़े सात रुपये की तनख़्वाह पर काम शुरू किया। इस तरह बाहरी मुल्क में मजदूरी करके कमाई गयी अपने खून-पसीने की कमाई को आपने। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की अपील पर इण्डियन नेशनल आर्मी को दान कर दी। हुआ यह था कि दूसरी जंगे-अज़ीम के दौरान, जब जापानी फ़ौज के सामने अंग्रेज़ी फ़ौज ने सरेंडर कर दिया था, तब नेताजी सुभाषचन्द्र बोस सिंगापुर आये और नौजवानों से अपील की कि वे इण्डियन नेशनल आर्मी में शामिल होकर भारत को अंग्रेज़ों से आज़ाद करायें। मोइनुद्दीन को बोसजी का भाषण इतना अच्छा लगा कि उन्होंने बर्मा मंे अपने खून-पसीने से कमाये 20,000 रुपये फ़ौरन उनके हवाले कर दिये अपने शुरुआती दौर मंे आप इण्डियन नेशनल आर्मी में भर्ती का काम देखते थे, मगर जब इण्डियन नेशनल आर्मी को राइफ़लमैन की ज़रूरत हुई तो वह आगे आये और हाथों में राइफल उठा ली। जब दूसरी जंगे-अज़ीम में जापान की हार हुई, तो 24 अप्रैल सन् 1945 को आप ख़ाली हाथ हिन्दुस्तान लौट आये। मगर उनके गांव में उनकी कोई मदद करनेवाला न था, जिसकी वजह से उनको वापस बर्मा लौटना पड़ा और दिसम्बर सन् 1948 मंे फातिमा नाम की लड़की से उनकी शादी हुई। सन् 1964 में उनका ख़ानदान वापस हिन्दुस्तान लौट आया। सन् 1997 में कोर्ट के आॅर्डर पर उनको स्वंतत्रता-सेनानी-सम्मान से नवाज़ा गया।
सैय्यद शहनवाज अहमद कादरी
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