जंग- ए- आज़ादी- ए- हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार - मुफ़्ती-ए-आज़म मुफ़्ती किफ़ायतुल्लाह...
"लहू बोलता भी है'
ज़रा याद उन्हें भी कर लो, जो लौट के घर न आये....
आईये, जंग- ए- आज़ादी- ए- हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार- "मुफ़्ती-ए-आज़म मुफ़्ती किफ़ायतुल्लाह" को जानते हैं:
मुफ़्ती-ए-आज़म मुफ़्ती किफ़ायतुल्लाह:
मुफ़्ती किफ़ायतुल्लाह हिन्दुस्तान के मुफ़्ती-ए-आज़म ही नहीं, बल्कि क़ाफ़ला-ए-हुर्रियत के क़ाफ़ला-सालार भी थे। आप एक ही वक़्त पर अदीब, सियासतदां और मुजाहिद भी थे।
आप शाहजहांपुर के एक ग़रीब ख़ानदान में सन् 1875 में पैदा हुए थे। आपकी प्राइमरी तालीम शाहजहांपुर में ही हुई। फिर दो साल तक आप जामिया क़ासिमया मदरसा शाही (मुरादाबाद) में पढ़े और तीन साल तक दारुल-उलूम (देवबंद) में आपने तालीम हासिल की।
आप अपनी ख़ुदादाद ज़हानत और अच्छे उस्तादों की सोहबत से 22 बरस में ही एक अज़ीम सियासतदां बन गये। कोई भी ऐसा इल्म नहीं था, जिसमें की आपको महारत न हासिल रही हो। फ़रागत के बाद तक़रीबन 5 साल तक आपने मदरसा ऐनुल-इल्म (शाहजहांपुर) में अपनी खि़दमत अंजाम दी और फिर उसके बाद मदरसा अमीनिया (देहली) में मुफ़्ती के ओहदे पर रहे।
इसके अलावा सियासी और क़ौमी तहरीक़ात में भी आपकी ख़िदमात बेमिसाल हैं। आपने तहरीके-शेख-उल-हिन्द में खुलकर हिस्सा लिया और 2 बार गिरफ़्तार भी हुए। पहली बार सन् 1930 की तहरीके-सिविल नाफ़रमानी में आप 11 अक्टूबर सन् 1930 को गिरफ़्तार होकर 6 महीने तक गुजरात की जेल में रहे। दूसरी बार एक लाख लोगों के साथ जुलूस की क़यादत करते हुए 31 मार्च सन् 1932 को आप गिरफ़्तार हुए और 18 महीने मुल्तान की जेल में रहे।
आपने अज़ीमुल क़द्र ख़िदमात पेश की। 31 दिसम्बर सन् 1952 को देहली में आपका इन्तक़ाल हुआ और वहीं दरगाह ख़्वाजा कुतबुद्दीन बख़्तयार काकी के जवार में आप दफ़नाये गये।
(साभार: शाहनवाज़ अहमद क़ादरी)
संपादक: स्वतंत्र भारत न्यूज़
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