निजी शिक्षकों को रोजी-रोटी का संकट: नवनीत मिश्र
संत कबीर नगर: यद्यपि करोना के कारण में समूची अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी मार प्राइवेट शिक्षण संस्थानों व शिक्षकों पर पड़ रही है। एक तरफ से स्कूल-कालेज हैं जिनके बंद रहने की स्थिति में स्कूल फीस नाम मात्र आती है। फिर भी उन्हे देर सवेर फीस मिल ही जाती है। बच्चों को अगली कक्षा प्रमोट होना है और मार्कशीट प्राप्त करनी है। तो उन्हे साल खत्म होते-होते सम्पूर्ण फीस जमा करनी पड़ती है। जबकि छोटे-बड़े ट्यूशन सेंटर तथा कोचिंग संस्थानों के साथ साथ ऐसा कदापि नहीं है। अगर कोई छात्र-छात्रा कोचिंग ट्यूशन क्लास नहीं करता है। तो वह न तो शुल्क देगा और न ही वह ऐसा करने के लिए किसी भी तरह से बाध्य है।
करोना काल में जब सभी तरह की व्यावसायिक गतिविधियां सुचारू रूप से जारी रखने के लिए सरकारें कवायद कर रही है। तो ऐसी स्थिति में मात्र शिक्षा तंत्र को निशाना बनाना कहां तक तर्कसंगत है और वह भी तब जब लाखों पढ़े-लिखे युवा बेरोजगार अपनी रोजी-रोटी के लिए ट्यूशन कोचिंग पढ़ा कर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। तब कोचिंग संस्थानों को पूरी तरह बंद रखकर इन प्राइवेट शिक्षकों के पेट पर लात मारना कहां तक है?
बजब सभी तरह की व्यवसायिक गतिविधियों को कोरोना प्रोटोकाल के तहत संचालित किया जा सकता है। तब ऐसे कोचिंग सेंटर जो रजिस्टर्ड हो उन्हे अनुमति दी जाए। इन संस्थानों में शिक्षक एवं छात्र दोनों ही पढ़े-लिखे समझदार वर्ग में आते हैं। जो कोरोना प्रोटोकॉल के अंतर्गत आने वाले सभी नियमों एवं सावधानियों का पालन आवश्यक रूप से करने में सक्षम भी हैं।
आज आवश्यकता यह है कि सभी जनप्रतिनिधि एवं सरकार में बैठे हुए जिम्मेदारों को इन लाखों युवा बेरोजगारों की रोजी-रोटी का ख्याल रखना ही पड़ेगा। जो प्राइवेट शिक्षण करते हुए अपने जीवन को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इस शिक्षित वर्ग को बेरोजगारी व भुखमरी के दलदल में धकेल कर सरकारों को कुछ हासिल होने वाला नहीं है। बल्कि इसके नकारात्मक प्रभाव से शीघ्र ही समाज पर परिलक्षित होने लगेंगे। जिसके लिए सरकार की ढुलमुल व लापरवाही पूर्ण नीतियां पूरी तरह जिम्मेदार होंगी। सरकारी तंत्र को चाहिए कि वह तुरंत ही करोना प्रोटोकॉल के अधीन सशर्तों इन प्राइवेट शिक्षण, कोचिंग तथा ट्यूशन सेंटर्स को खोलने की अनुमति दें। जिससे न केवल शिक्षकों का भरण-पोषण हो सके बल्कि अपने करियर में गंभीर रहने वाले छात्र-छात्राओं को भी पठन-पाठन का उपयुक्त लाभ मिल सके और सभी तनाव व अवसाद से बच सके।
(नवनीत मिश्र)
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