लहू बोलता भी है: जंगे आज़ादी ए हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार __मीर मोहम्मद हसन खान- नाज़िम गोण्डा
आइये जानते हैं, आजादी-ए-हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार- मीर मोहम्मद हसन खान - नाज़िम गोण्डा को
मीर मोहम्मद हसन खान गोरखपुर के महाज़ पर अंग्रेज़ों को अपनी जवांमर्दी और बहादुरी का लोहा मनवाया। आप सन् 1857 की जंग की एक अहम कड़ी रहे हैंए जिसको बहुत तफ़सील से कमालुद्दीन खान हैदर ने कैसरुत बातारीख़ में बयान किया है।
यहां उनकी ज़िन्दगी का छोटे.सा वाक़िया पेश किया जा रहा है। मीर मोहम्मद हसन ख़ान ने अंग्रेज़ों से लोहा लेने के लिए गोरखपुर का इलाका चुना। अपने साथियों के साथ जब वह गोरखपुर के लिये रवाना हुएए तो अंग्रेजी फौज ने उन्हें रास्ते में रोकने की कोशिश की। लेकिन वह लड़ते.भिड़ते गोरखपुर पहुंच गये। वहां उन्होंने जेल पर हमला करके जेल में बंद भारतीय कैदीयों को छुड़ा लिया और अपनी फ़ौज बनाकर बाक़ायदा अपनी हुकूमत का एलान कर दिया। उसके बाद एक ख़त भी अवध भेजाए जिसका जवाब मय खिलअत सरफ़राज़ी व खिताब मुकर्रबुदौला हुकूमत बिरजिस कदर से इनायत हुआ। साथ ही इंकलाबियों की बड़ी तादाद उनका साथ देने के लिए गोरखपुर पहुंची और उसने गोरखपुर में होने वाली मुठभेड़ों में बढ़.चढ़कर हिस्सा लिया। मोहम्मद हसन खान ने राजा नेपाल से भी मदद मांगीए मगर वहां उन्हें मायूस होना पड़ा। चूंकि महाराजा नेपाल अंग्रेजो का ख़ैरख्वाह थाए इसलिए उसने मोहम्मद हसन खान की ताक़त को कुचलने के लिए अंग्रेजों का भरपूर साथ दिया। मोहम्मद हसन और उनकी फ़ौज ने नेपाल के राजा और अंग्रेज़ों की फौज का बड़ी जवांमर्दी से मुक़ाबला कियाए लेकिन इस ताक़त ने उन्हें मैदान छोड़ने पर मजबूर कर दिया। लड़ाई में बड़े पैमाने पर जान.माल का नुकसान हुआ।
उसके बाद मोहम्मद हसन खान फैज़ाबाद पहुचे। लेकिन वहां भी न रुक सके और आप टाण्डा आ गये। इसी दौरान नादर मिर्जा दोस्त अली के साथ राजा मान सिंह उनकी मदद के लिए फैज़ाबाद से रवाना हुएए लेकिन रास्ते में अंग्रेज़ी फौजों की घेराबंदी की वजह से आगे न बढ़ सके। मायूसी में मोहम्मद हसन खान बूंदी पहुंचे ताकि बेगम हज़रत महल के साथ मिलकर अंग्रेज़ों का मुकाबला कर सकें। जब वहां भी मुक़ाबला मुमकिन न हो सका तो आप नेपाल की तरफ चले गये। लेकिन जब अंग्रेजों की तरफ से आम माफ़ी का एलान हुआ तो आप फिर लखनऊ आ गये।
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