लहू भी बोलता है: जंगे आज़ादी ए हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार- हकीम अजमल खान
आइये, जानते हैं, जंगे आज़ादी ए हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार______हकीम अजमल खान को,
हकीम अजमल खान की पैदाइश 12 फरवरी सन् 1868 में देहली में हुई थी। आपके वालिद का नाम हक़ीम अब्दुल गुलाम मोहम्मद था जो कि उस ज़माने के मशहूर हकीमों में माने जाते थे और साहबे-हैसियत व बावक़ार ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे।
अजमल साहब ने कई सब्जेक्टस में आला तालीम हासिल की लेकिन आपका मक़सद तालीम के बाद डाॅक्टरी प्रेक्टिस करके अपने वालिद के नक्शे कदम पर चलने का था। जिसे आपने अपनी मेहनत से हासिल किया और मेडिकल प्रेक्टिस करने लगे। बहुत ही कम वक़्त में आपका नाम मशहूर हो गया।
मेडिकल प्रेक्टिस के साथ ही मुल्क की आज़ादी के लिये मज़बूत सोंच व फिक्र रखते थे। आप सन् 1906 में शिमला डेलिगेशन, जो वाइसराय से मिलने के लिए गया थाद्धमें पहले व अकेले मुस्लिम नुमाइन्दे थे।
इसके बाद कांग्रेस के कुछ रहनुमाओं से नज़रियाती इख़तिलाफ़ की वजह से आपने मुस्लिम लीग ज्वाइन कर ली और आलॅ इण्डिया मुस्लिम लीग के वाइस-प्रेसिडेंट बने। मुस्लिम लीग में जाने के बाद भी आपका मिज़ाज पूरी तरह कौमी मूवमेंट के साथ था। मूवमेंट कांग्रेस या लीग का बटा हुआ नही था आप हर उस प्रोग्राम में हिस्सा लेते जो जंगे-आज़ादी के लिए हुआ करता था।
सन् 1916 में लखनऊ पैक्ट कांग्रेस व लीग के बीच कराने में आपने बहुत मेहनत की थी।
आपकी कोशिशों से ही ये पैक्ट अमल में आया।
इसके बाद आपके महात्मा गांधी से बहुत अच्छे ताल्लुक़ात हो गये और फिर इण्डियन नेशनल कांग्रेस की सियासत में एक्टिव हो गये।
सन् 1918 में जब दिल्ली में कांग्रेस की कांफ्रेंस हुई तो आप इस्तक़बालिया कमेटी के चेयरमैन बनाये गये।
आप ख़िलाफ़त और नाॅन-कोआॅपेशन मूवमेन्ट के शुरू से ही बड़े आॅरगनाईज़र रहे। आपकी वजह से आपको मानने वाले बड़ी तादात में नाॅन-कोआॅपरेटिव मूवमेंट में हिस्सा लेते थे। आप दौराने-मूवमेंट कई बार में जेल गये।
खिलाफत मूवमेंट के आप बड़े रहनुमाओं में गिने जाते थे इसी मूवमेंट के दौरान आपकी खि़दमात की बिना पर आपको कैसर-ए-हिन्द व हाजिकुल-मुल्क के ख़िताब से नवाज़ा गया।
जनवरी सन् 1920 में खिलाफत मूवमेंट के इशू पर वाईसराय से मिलने वाले डेलिगेशन के आप मेम्बर थे। आप सन् 1921 में इण्डियन नेशनल कांग्रेस के हैदराबाद कांफ्रेंस में सदर बनाये गये। आप पहली मुस्लिम युनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के चांसलर बनाये गये। आप हमेशा हिन्दू-मुस्लिम को एक साथ लेकर आज़ादी की जंग लड़ने के हामी रहे।
10 मार्च सन् 1922 को जब गांधीजी को गिरतार किया गया तो हक़ीम साहब ने एक बड़ा मुज़ाहरा युनिवर्सिटी के लोगों को साथ लेकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ किया। आपके घर पर ही सितम्बर सन् 1924 में मुल्क के पैमाने पर मूवमेंट चलाने के लिये अहम मीटिंग हुई।
आप एक अच्छे डाॅक्टर एक अच्छे लीडर के साथ-साथ एक अच्छे शायर भी थे।
हकीम साहब ने सियासत की तंगनज़री के हालात को देखते हुए सन् 1925 से एक्टिव सियासत से अपने आपको अलग कर लिया लेकिन जब तक ज़िंदा रहे नेशनलिस्ट ख्यालों व हिन्दू-मुस्लिम एकता को तरजीह देते रहे।
बीमारी की वजह से 29 दिसम्बर सन् 1927 को आपको इंतक़ाल हो गया।
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