लहू बोलता भी है: आज़ाद ए हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार- मौलवी इलायादाथा मोईदू
आईये जानते हैं,
आज़ाद ए हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार- मौलवी इलायादाथा मोईदू को.........
मौलवी इलायादाथा मोईदू:
मौलवी मोईदू की पैदाइश सन् 1890 में मालाबार (केरल) के मारनचेरी गांव ज़िला में हुई थी। आपने शुरुआती तालीम मुक़ामी स्कूल में हासिल की और आला तालीम के लिए अरबिक कॉलेज (वज़क्कड़) गये, जहां से तालीम पूरी करके लौटे। अपने काम में आपका मन नहीं लगा, क्योंकि आप मिजाज़न मुल्क की आज़ादी के लिए फ़िक्रमंद रहा करते थे। मालाबार में एक साल रहकर सन् 1919 में आप इण्डियन नेशनल कांग्रेस के मेम्बर बने और नेशनल मूवमेंट में कूद पड़े। सबसे पहले आपने होमरूल मूवमेंट में हिस्सा लिया। आप एक अच्छे ओरेटर और आर्गनाइज़र थे।
आपकी मीटिंगों में तक़रीर से अवाम में जंगे-आज़ादी के लिए जोश और हौसला पैदा होता था। उस वक़्त केरल में कांग्रेस लीडर मोहम्मद अब्दुल रहमान नेशनल मूवमेंट के इंचार्ज थे। उन्हीं के साथ आपने ख़िलाफ़त और नान कोआपरेटिव मूवमेंट में हिस्सा लिया। इसी दौरान आपकी महात्मा गांधी और अली बदर्स से मुलाकात हुई। नान कोआपरेटिव मूवमेंट में सन् 1921 में आप गिरफ़्तार किये गये और ढाई साल की सज़ा हुई।
सज़ा से लौटने पर आपने मोपला सोसायटी जो उन दिनों अंग्रेज़ों से हिंसात्मक आंदोलन कर रही थी, को समझाने की ज़िम्मेदारी सम्भाली और एक कमेटी मजलिसे-उलमा क़ायम करके मोपला-लीडर मौलवी अली मुसालियर के साथ मिलकर मोपलाओं को हिंसा के रास्ते से हटाकर गांधीजी के बताये रास्ते पर लाकर अहिंसक आंदोलन के लिए तैयार करने में बहुत मेहनत की। शुरू में मोपला सोसायटी इसके लिए तैयार नहीं हो रही थी, क्योंकि अंग्रेज़ों और मुक़ामी ज़मीदारों ने मोपलाओं के साथ बहुत ज़्ाुल्म किये थे। मगर बाद में मोपला तैयार हुए। इसके बाद आप सन् 1929 में कालीकट चले गये जहां अल अमीन अख़बार के ज़रिये आपने नेशनल मूवमेंट का प्रोपगण्डा शुरू किया, लेकिन अंग्रेज़ नौकरशाहों ने अख़बार बन्द करा दिया।
इसके बाद आपने सन् 1930 में पय्यानूर जाकर नमक आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन में आपकी क़यादत में बड़ी तादात में लोग शामिल हुए। आपकी शोहरत और लीडरशिप को देखकर अंग्रेज़ अफ़सरों ने आपके साथ ज़्यादतियां करना शुरू किया और आपको वहां से जाने के लिए कहा, लेकिन आप माने नहीं तो आपको गिरफ़्तार कर लिया, मारपीट करके बंद कर दिया और 9 महीने की सज़ा देकर जेल भेज दिया।
आप जेल से छूटकर आये तो मालाबार की अवाम ने सन् 1938 में आपको डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का मेम्बर चुना। अब आप पूरे केरल में बुलाये जाते और आंदोलन की पहली सफ़ के नेताओं में आपका नाम लिया जाता था। सन् 1942 में क्विट इण्डिया मूवमेंट में आप फिर गिरफ़्तार किये गये और तीन साल की सज़ा सुनाकर जेल भेज दिये गये।
आप मुस्लिम लीग की कम्युनल सियासत के बिल्कुल खि़लाफ़ थे। आप किसी भी हालत में मुल्क के बंटवारे की बात सुनना भी नहीं चाहते थे। जब इस तरह की सियासत ज़ोर पकड़ने लगी, तब आपने अपने-आपको सोशल रिफार्म और तालीमी बेदारी के मुहिम पर लगा दिया। इससे जब कुछ वक़्त बचता, तो आपने किताबें लिखनी शुरू कर दिया। कई जुबानों में आपकी दर्जनों किताबें शाया हुईं। आज़ादी के बाद आपको कांग्रेस लीडरशिप ने राज्यसभा का एम.पी. बनाने की पेशकश की, जिसे आपने ठुकरा दिया और अपनी बची ज़िन्दगी समाजी और तालीमी कामों को फरोग़ देने में गुज़ार दी। आपका इंतकाल सन् 1995 में हुआ।
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