सैय्यद मोहम्मद - आईये, जंग -आज़ादी -ए - हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार को जानते हैं...
लहू बोलता भी है
आईये, जंग -आज़ादी -ए - हिन्द के एक और मुस्लिम किरदार- नवाब सैय्यद मोहम्मद को जानते हैं___
नवाब सैय्यद मोहम्मद:
नवाब सैय्यद मोहम्मद साउथ इण्डिया के सबसे अमीर मुसलमानों में से एक और मीर हुमायूं बहादुर के बेटे थे। हुमायूं बहादुर नेशलिस्ट सोच के मुसलमान थे, जिन्होंने अपनी शुरूआती सियासी दिनों में कांग्रेस को मज़बूत करने के लिए ज़हनी और माली ताऊन दिया।
सन् 1887 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीसरे इजलास में हुमायूं बहादुर ने कांग्रेस के तंज़ीमी कामो के तौर पर मदद दी थी। उनकी वालिदा का ताल्लुक टीपू सुल्तान के ख़ानदान से था। वे टीपू सुल्तान के चैथे बेटे सुल्तान यासीन की बेटी शहज़ादी शाहरुख़ बेग़म के पोते थे। सैय्यद मोहम्मद का सियासी सफ़र दिल्ली और मद्रास के बीच ही रहा जब तक मुस्लिम लीग का क़याम नहीं हुआ था।
आपके ख़्यालात दुनियाबी और टेक्निकल दोनों तरह की तालीम को हिन्दुस्तान के लोगों देने के क़ायल थे। इसके लिए आपने भरपूर कोशिश की और कामयाब भी हुए।
आप सन् 1894 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और संगठन के सक्रिय सदस्य बने। अपकी सभी तक़रीरों में इस बात पर ज़्यादा जोर दिया जाता कि मुसलमानों और हिन्दुओं को आपस में भाइयों की तरह जीना चाहिए और उनके अलग-अलग मज़हब उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं करते, बल्कि उन्हें एक-साथ जोड़कर रखते हैं। कांग्रेस के आंदोलनों में भी आप सक्रिय रहे। आपका मानना था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मक़सद मजबूत मुल्क के लिए भारत के लोगों को एकजुट करने का है। गोपालड्डष्ण गोखले के साथ आपको भी राजनीति में एक सेकुलर नेता के तौर पर माना जाता था। आप हिंसा के ज़रिये मूवमेंट के क़ायल नहीं थे और गांधीजी के रास्ते मुल्क की आज़ादी चाहते थे। आप दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों से नस्लीय भेदभाव से दुःखी थे।
आपने पहली जंगे-अज़ीम के दौरान ब्रिटिश हुकूमत की तुर्की के ख़िलाफ़ की गयी कार्यवाही की सख़्त मज़ाहमत की और हिन्दुस्तानी मुसलमानों से एकजुट होकर तुर्की की मदद की अपील की। आप अवाम की समाजी तरक्की के पैरोकार और मददगार थे। सन् 1903 में आप मद्रास महाजन सभा के सदर बनाये गये। सन् 1913 में आॅल इण्डिया कांग्रेस कमेटी के सदर बनाये गये। इससे पहले सन् 1896 में आप मद्रास के पहले मुस्लिम शेरिफ बनाये गये थे। सन् 1900 में आप मद्रास विधान परिषद् और सन् 1905 में इम्पिरियल विधान परिषद् के मेम्बर बनाये गये। आपको ब्रिटिश हुकूमत ने नवाब के खिताब से नवाज़ा था। आपका इंतकाल 12 फरवरी, सन् 1919 को हुआ।
(साभार: शहनवाल क़ादरी )
सम्पादक- स्वतंत्र भारत न्यूज़
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